पहला पाठ : प्रेरित-चरित 5:17-26
17) यह सब देख कर प्रधानयाजक और उसके सब संगी-साथी, अर्थात् सदूकी सम्प्रदाय के सदस्य, ईर्ष्या से जलने लगे।
18) उन्होंने प्रेरितों को गिरफ्तार कर सरकारी बन्दीगृह में डाल दिया।
19) परन्तु ईश्वर के दूत ने रात को बन्दीगृह के द्वार खोल दिये और प्रेरितों को बाहर ले जा कर यह कहा,
20) “जाइए और निडर हो कर मन्दिर में जनता को इस नव-जीवन की पूरी-पूरी शिक्षा सुनाइए”। उन्होंने यह बात मान ली और भोर होते ही वे मन्दिर जा कर शिक्षा देने लगे।
21) जब प्रधानायाजक और उसके संगी-साथी आये, तो उन्होंने महासभा अर्थात् इस्राएली नेताओं की सर्वोच्च परिषद् बुलायी और प्रेरितों को ले आने के लिए प्यादों को बन्दी-गृह भेजा।
22) जब प्यादे वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने प्रेरितों को बन्दीगृह में नहीं पाया। उन्होंने लौट कर यह समाचार दिया,
23) “हमने देखा कि बन्दीगृह बड़ी सावधानी से बन्द किया हुआ है और पहरेदार फाटकों पर तैनात हैं, किन्तु खोलने पर हमें भीतर कोई नहीं मिला।
24) यह सुन कर मन्दिर-आरक्षी के नायक और महायाजक यह नहीं समझ पा रहे थे कि प्रेरितों का क्या हुआ है।
25) इतने में किसी ने आ कर उन्हें यह समाचार दिया, “देखिए, आप लोगों ने जिन व्यक्तियों को बन्दीगृह में डाल दिया, वे मन्दिर में जनता को शिक्षा दे रहे हैं”।
26) इस पर मन्दिर का नायक अपने प्यादों के साथ जा कर प्रेरितों को ले आया। वे प्रेरितो को बलपूर्वक नहीं लाये, क्योंकि वे लोगों से डरते थे कि कहीं हम पर पथराव न करें।
सुसमाचार : योहन 3:16-21
16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।
17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।
18) जो पुत्र में विश्वास करता है, वह दोषी नहीं ठहराया जाता है। जो विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहराया जा चुका है; क्योंकि वह ईश्वर के एकलौते पुत्र के नाम में विश्वास नहीं करता।
19) दण्डाज्ञा का कारण यह है कि ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे।
20) जो बुराई करता है, वह ज्योंति से बैर करता है और ज्योति के पास इसलिए नहीं आता कि कहीं उसके कर्म प्रकट न हो जायें।
21) किन्तु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के पास आता है, जिससे यह प्रकट हो कि उसके कर्म ईश्वर की प्रेरणा से हुए हैं।
मनन चिंतन (फादर साइमन मोहता (इंदौर धर्मप्रांत))
प्रभु के कार्य में कितनी भी बाधा क्यों न आ जाये, लेकिन उनका कार्य जारी रहेगा। उसे कोई भी नहीं रोक पायेगा। प्रधान याजक और कुछ सदूकियों ने प्रेरितों का बन्दीग्रह में ड़लवा दिया। ईश्वर के दूत ने उन्हें रिहा कर निड़रता से पुनर्जीवित प्रभु की शिक्षा का प्रचार करने का आदेश दिया। महायाजक और अन्य लोग इस घटना को समझ नहीं पा रहे थे। वे फिर जा कर उन्हें गिरफ्तार करना चाहते हैं। प्रेरित निर्भीकता से प्रभु का वचन सनते हैं।
ईश्वर हमसे प्यार करते हैं, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को इस संसार में भेजा। और जो उनमें विश्वास करता है, उसका सर्वनाश नहीं होगा बल्कि वह अनंत जीवन प्राप्त करेगा। प्रभु येसु हमें जीवन देने आये, उनके द्वारा हम परिपूर्ण जीवन का आनंद ले सकते हैं। प्रेरितों ने जीवंत ईश्वर के पुत्र पर विश्वास किया इसलिए वे मौत से भी नहीं ड़रते क़्योंकि प्रभु उनका सहारा एवं बल हैं।
क्या हम ईश्वर से प्रेम करते हैं? आइये, हम अनंत जीवन की ओर आगे बढ़े।
